संवेदनशील POCSO मामले में बड़ी कानूनी राहत



संवेदनशील POCSO मामले में बड़ी कानूनी राहत

माननीय पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए POCSO Act के अंतर्गत दोषसिद्ध आरोपी की सज़ा को स्थगित (Sentence Suspended) करते हुए अपील लंबित रहने तक जमानत प्रदान की है।

आरोपी को माननीय सत्र न्यायालय, भिवानी (हरियाणा) द्वारा 20 वर्ष के कठोर कारावास की सज़ा सुनाई गई थी तथा वह लगभग 3 वर्षों से जेल में निरुद्ध था।

मामले के तथ्यों की गहन समीक्षा, मजबूत कानूनी रणनीति, प्रभावशाली बहस, तथ्यों एवं विरोधाभासों के सूक्ष्म विश्लेषण तथा उत्कृष्ट अपीलीय पैरवी के उपरांत माननीय हाई कोर्ट ने आरोपी/अपीलकर्ता को राहत प्रदान की।

अपीलकर्ता/आरोपी की ओर से अधिवक्ता:

Dr. Anthony Raju
Advocate, Supreme Court of India
भारत के अग्रणी Criminal एवं POCSO मामलों के विशेषज्ञ

Advocate Pragyat Bhardwaj

यह मामला पुनः सिद्ध करता है कि प्रत्येक आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई, प्रभावी कानूनी सहायता तथा संविधान एवं कानून के अनुसार न्याय पाने का अधिकार है।

🔹 मजबूत डिफेंस स्ट्रेटेजी
🔹 तथ्यों एवं विरोधाभासों का गहन विश्लेषण
🔹 उत्कृष्ट कानूनी योजना
🔹 आपराधिक कानून पर गहरी पकड़
🔹 हाई कोर्ट में प्रभावशाली अपीलीय पैरवी
Dr. Anthony Raju, Advocate Supreme Court, देशभर में जटिल एवं संवेदनशील आपराधिक मामलों, विशेषकर POCSO, झूठे मामलों, बेल, FIR Quashing एवं संवैधानिक आपराधिक मुकदमों के विशेषज्ञ के रूप में प्रसिद्ध हैं।

“सज़ा सुनाया जाना न्याय का अंत नहीं — अपीलीय न्यायालय आज़ादी, निष्पक्षता और संवैधानिक अधिकारों के अंतिम रक्षक हैं।”

✔️ 20 साल की सज़ा — फिर भी हाई कोर्ट से मिली जमानत!
✔️ 3 साल जेल में रहने के बाद मिली बड़ी राहत
✔️ मजबूत डिफेंस ने बदल दिया पूरे केस का रुख
✔️ हर दोषसिद्धि को कानून के तहत चुनौती दी जा सकती है
✔️ आपराधिक अपीलों में मजबूत कानूनी रणनीति अत्यंत महत्वपूर्ण

📞 कानूनी सहायता एवं परामर्श हेतु
WhatsApp: +91 8588872001
 office@humanrightscouncil.in

केस विवरण:
RAJINDER @ KALU @ RAJINDER KUMAR
बनाम
STATE OF HARYANA

CRM-17684-2026
Punjab and Haryana High Court

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DISCLAIMER:
यह प्रेस नोट केवल कानूनी जागरूकता एवं सूचना के उद्देश्य से जारी किया गया है। जमानत अथवा सज़ा स्थगन प्रत्येक मामले के तथ्यों, साक्ष्यों, न्यायिक विवेक एवं केस की परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इसे अंतिम निर्णय अथवा कानूनी सलाह के रूप में न माना जाए।

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